“संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा—मतभेद रहें, लेकिन मनभेद नहीं; देश पहले, राजनीति बाद में।”

देश की संसद में आज एक महत्वपूर्ण संदेश गूंजा, जब राष्ट्रपति ने संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए राष्ट्रनिर्माण की बुनियादी सोच पर जोर दिया। अपने वक्तव्य में उन्होंने महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की लोकतांत्रिक शक्ति तभी मजबूत होती है जब निर्वाचित प्रतिनिधि राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दें।
राष्ट्रपति ने कहा कि गांधीजी का सत्य और अहिंसा का मार्ग और नेहरू का आधुनिक भारत का दृष्टिकोण आज भी राष्ट्र की दिशा तय करने वाले स्तंभ हैं। उन्होंने सांसदों से अनुरोध किया कि संसद को टकराव का नहीं, संवाद और समाधान का मंच बनाया जाए। राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि देश की जनता उम्मीद करती है कि उनके प्रतिनिधि मिलकर काम करेंगे और विकास, न्याय व समानता पर केंद्रित निर्णय लेंगे।
उन्होंने जोर दिया कि आने वाली चुनौतियाँ—चाहे आर्थिक हों, सामाजिक हों या तकनीकी—इनसे निपटने के लिए एकजुट प्रयास अत्यंत आवश्यक हैं। राष्ट्रपति के संबोधन के दौरान सदन में शांत और सकारात्मक माहौल देखा गया।
संबोधन के अंत में उन्होंने दोहराया कि “देश सर्वोपरि है”, और सांसदों से आग्रह किया कि वे आने वाले सत्रों में रचनात्मक बहस और सहयोग की मिसाल पेश करें।






