टीन-शेड में अभ्यास, भूखे पेट संघर्ष और फिर इंटरनेशनल मेडल्स की चमक

Raipur से एक प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जिसने पूरे देश का दिल जीत लिया है। यहां की एक पैरा-एथलीट ने बताया कि कैसे लोग उसे “चार फुटिया”, “बौनी” कहकर चिढ़ाते थे, उसका मनोबल गिराने की कोशिश करते थे। लेकिन उसने इन शब्दों को कमजोरी नहीं, अपनी ताकत बनाया।
कम उम्र में ही मां-पिता का साया उठ गया। परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। ऐसे मुश्किल हालात में उसके भाई ने पढ़ाई और खेल जारी रखने के लिए चाय ठेले में काम किया। घर भी पक्का नहीं था—एक छोटे से टीन-शेड में यह परिवार अपने सपनों को जिंदा रखे हुए था।
संघर्ष यहीं खत्म नहीं हुए। पैसे की कमी, कमजोर ट्रेनिंग सुविधाएँ और सामाजिक ताने—सब कुछ उसके रास्ते में दीवार बनकर खड़ा था। लेकिन इस पैरा-एथलीट ने हार नहीं मानी। दिन-रात मैदान में मेहनत की और आज गोल्ड और सिल्वर मेडल जीतकर न सिर्फ रायपुर बल्कि पूरे देश का नाम रोशन कर रही हैं।
उनकी यह कहानी साबित करती है कि परिस्थितियाँ कितनी भी कठोर क्यों न हों, जज्बा और मेहनत हो तो हर लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।






