भारत में आईवीएफ तकनीक ने लाखों दंपतियों को माता-पिता बनने की उम्मीद दी। जानिए देश में पहले टेस्ट-ट्यूब बेबी के जन्म और इस उपलब्धि का इतिहास।

भारत में आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) तकनीक का इतिहास चिकित्सा विज्ञान की बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है। दुनिया का पहला आईवीएफ शिशु Louise Brown 1978 में ब्रिटेन में जन्मा था। इसी वर्ष भारत ने भी इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की।

भारत का पहला आईवीएफ शिशु ‘दुर्गा’ (कनुप्रिया अग्रवाल) 3 अक्टूबर 1978 को जन्मा था। इस उपलब्धि का श्रेय प्रसिद्ध वैज्ञानिक और चिकित्सक Subhas Mukhopadhyay को दिया जाता है। उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद आईवीएफ तकनीक के जरिए यह सफलता हासिल की थी।
हालांकि उस समय उनकी उपलब्धि को पर्याप्त मान्यता नहीं मिली और उनके शोध पर सवाल उठाए गए। बाद में वैज्ञानिक समुदाय ने उनके कार्य के महत्व को स्वीकार किया और उन्हें भारत में आईवीएफ तकनीक का अग्रदूत माना गया।

आईवीएफ प्रक्रिया में महिला के अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु को प्रयोगशाला में निषेचित किया जाता है। इसके बाद विकसित भ्रूण को महिला के गर्भाशय में स्थापित किया जाता है। यह तकनीक उन दंपतियों के लिए वरदान साबित हुई है जो प्राकृतिक रूप से संतान प्राप्ति में कठिनाइयों का सामना करते हैं।
आज भारत दुनिया के प्रमुख आईवीएफ केंद्रों में शामिल है। देशभर में हजारों फर्टिलिटी क्लीनिक आधुनिक तकनीकों की मदद से उपचार प्रदान कर रहे हैं और लाखों परिवारों को संतान सुख प्राप्त करने में सहायता कर रहे हैं।




