कई लोग फोन की घंटी बजते ही घबरा जाते हैं या कॉल उठाने से बचते हैं। विशेषज्ञ इसे ‘टेलीफोबिया’ कहते हैं, जो एक तरह की चिंता (एंग्जायटी) से जुड़ी समस्या हो सकती है।

आज के डिजिटल दौर में जहां मोबाइल फोन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें फोन पर बात करने से घबराहट, तनाव या डर महसूस होता है। अगर किसी व्यक्ति को फोन कॉल करने या रिसीव करने के नाम पर बेचैनी होने लगे, बार-बार कॉल टालने की आदत हो या फोन बजते ही घबराहट महसूस हो, तो इसे टेलीफोबिया (Telephobia) कहा जाता है। यह कोई आधिकारिक मानसिक रोग का अलग निदान नहीं है, बल्कि आमतौर पर सोशल एंग्जायटी या अन्य चिंता संबंधी समस्याओं से जुड़ा एक लक्षण या डर माना जाता है।
टेलीफोबिया से पीड़ित व्यक्ति अक्सर फोन पर बात करने से बचने की कोशिश करता है। ऐसे लोग कॉल करने की बजाय मैसेज या ईमेल भेजना ज्यादा पसंद करते हैं। कई बार जरूरी कॉल को भी नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे उनकी पढ़ाई, नौकरी, व्यवसाय और व्यक्तिगत रिश्तों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, टेलीफोबिया के पीछे कई कारण हो सकते हैं। पहले कभी फोन पर नकारात्मक अनुभव होना, गलत बोलने का डर, सामने वाले की प्रतिक्रिया को लेकर चिंता, आत्मविश्वास की कमी, सोशल एंग्जायटी या लगातार तनाव इसकी प्रमुख वजहें हो सकती हैं। कुछ लोगों को यह डर रहता है कि फोन पर बात करते समय वे अपनी बात सही तरीके से नहीं रख पाएंगे या उनसे कोई गलती हो जाएगी।
टेलीफोबिया के सामान्य लक्षण
- फोन की घंटी बजते ही घबराहट या बेचैनी होना।
- कॉल रिसीव करने या करने से बचना।
- फोन पर बात करने से पहले अत्यधिक तनाव महसूस करना।
- दिल की धड़कन तेज होना, पसीना आना या हाथ कांपना।
- जरूरी कॉल को भी टालते रहना और मैसेज के जरिए बातचीत करना।
- फोन पर बातचीत खत्म होने के बाद भी अपनी बातों को लेकर चिंता करते रहना।

कैसे करें बचाव?
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस डर को धीरे-धीरे अभ्यास के जरिए कम किया जा सकता है। शुरुआत छोटे और परिचित लोगों को कॉल करके करें। बातचीत से पहले जरूरी बिंदु लिख लें ताकि आत्मविश्वास बना रहे। गहरी सांस लेने जैसी रिलैक्सेशन तकनीकों का अभ्यास करें और जरूरत पड़ने पर किसी मनोवैज्ञानिक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लें। यदि यह समस्या लंबे समय तक बनी रहती है और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तो पेशेवर मदद लेना उचित रहता है।
विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि टेलीफोबिया को नजरअंदाज करने के बजाय समय रहते पहचानना जरूरी है। सही मार्गदर्शन, नियमित अभ्यास और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता से अधिकांश लोग इस डर पर काफी हद तक काबू पा सकते हैं और सामान्य रूप से फोन पर बातचीत करने में सहज महसूस करने लगते हैं।






