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Tamil Nadu: विजय के सहयोगी दलों के भोज से वाम दलों ने बनाई दूरी, क्या गठबंधन में बढ़ रही है खटास?

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सीपीआई और सीपीएम के नेताओं के भोज में शामिल न होने से सियासी अटकलें तेज, हालांकि दोनों दलों ने सरकार को समर्थन जारी रहने की बात दोहराई।

 

 

तमिलनाडु की राजनीति में मुख्यमंत्री विजय की अगुवाई वाली सरकार के सहयोगी दलों के बीच नई चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है। हाल ही में आयोजित सहयोगी दलों के एक भोज में वामपंथी दलों के शामिल नहीं होने के बाद राजनीतिक गलियारों में गठबंधन की मजबूती को लेकर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि, वाम दलों का कहना है कि भोज में शामिल न होने का मतलब सरकार से समर्थन वापस लेना नहीं है और इसे राजनीतिक मतभेद के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

सूत्रों के अनुसार, इस भोज में सत्तारूढ़ गठबंधन के कई सहयोगी दलों के नेताओं को आमंत्रित किया गया था, लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) के वरिष्ठ नेताओं ने इसमें हिस्सा नहीं लिया। इसके बाद विपक्ष ने दावा किया कि गठबंधन के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम ने गठबंधन की आंतरिक राजनीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

हालांकि वाम दलों के नेताओं ने स्पष्ट किया है कि उनकी प्राथमिकता सरकार की नीतियों पर रचनात्मक सहयोग देना है। उन्होंने कहा कि किसी सामाजिक या औपचारिक कार्यक्रम में शामिल न होना राजनीतिक समर्थन खत्म होने का संकेत नहीं माना जाना चाहिए। इससे पहले भी सरकार गठन के दौरान वाम दलों ने विजय का समर्थन किया था और उन्हें सरकार बनाने के लिए आवश्यक संख्याबल जुटाने में अहम भूमिका निभाई थी।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि गठबंधन सरकारों में सहयोगी दलों के बीच अलग-अलग मुद्दों पर मतभेद होना सामान्य बात है। जब तक नीतिगत समर्थन बना रहता है, ऐसे घटनाक्रमों को सरकार के लिए तत्काल खतरे के रूप में नहीं देखा जाता। फिलहाल किसी भी सहयोगी दल ने सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा नहीं की है और न ही गठबंधन टूटने के संकेत दिए हैं।

ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि वाम दलों का भोज से दूरी बनाना गठबंधन में किसी बड़े बदलाव का संकेत है। आने वाले दिनों में सरकार और सहयोगी दलों के बीच होने वाली बैठकों तथा राजनीतिक फैसलों पर नजर रहेगी, जिससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह केवल एक औपचारिक दूरी थी या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक संदेश छिपा है।

Lokseva Bureau
Author: Lokseva Bureau

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