श्रावण मास में पड़ने वाला शनि प्रदोष व्रत भगवान शिव और शनिदेव दोनों की कृपा प्राप्त करने का विशेष अवसर माना जाता है जानिए व्रत की तिथि, पूजा का शुभ समय और इससे जुड़े धार्मिक नियम।
हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। जब प्रदोष व्रत शनिवार के दिन पड़ता है तो उसे शनि प्रदोष व्र

त कहा जाता है। यह व्रत भगवान शिव के साथ-साथ शनिदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए भी विशेष फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से पूजा करने पर जीवन के कष्ट, शनि दोष, आर्थिक परेशानियां और मानसिक तनाव दूर होते हैं तथा सुख-समृद्धि और सफलता की प्राप्ति होती है।
वर्ष 2026 में श्रावण मास का शनि प्रदोष व्रत 1 अगस्त, शनिवार को मनाया जाएगा। इस दिन त्रयोदशी तिथि में भगवान शिव की प्रदोष काल में पूजा का विशेष महत्व है। श्रद्धालु दिनभर व्रत रखकर शाम के समय शिव परिवार की पूजा करते हैं और शिवलिंग का जल, दूध, दही, शहद, घी तथा गंगाजल से अभिषेक करते हैं। इसके बाद बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल, चंदन, अक्षत और फल अर्पित किए जाते हैं। अंत में शिव चालीसा, महामृत्युंजय मंत्र और प्रदोष व्रत कथा का पाठ कर भगवान शिव की आरती की जाती है।
शनि प्रदोष व्रत की पूजा विधि
- प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
- पूरे दिन सात्विक आहार लें या श्रद्धानुसार निर्जला अथवा फलाहार व्रत रखें।
- प्रदोष काल में शिव मंदिर जाएं या घर में शिवलिंग की स्थापना कर पूजा करें।
- शिवलिंग का गंगाजल, दूध, दही, शहद, घी और शक्कर से अभिषेक करें।
- भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, भस्म, चंदन, सफेद पुष्प और मौसमी फल अर्पित करें।
- “ॐ नमः शिवाय” और महामृत्युंजय मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें।
- शनिदेव की पूजा कर सरसों का तेल, काले तिल और उड़द की दाल अर्पित करें।
- अंत में शिव आरती और प्रदोष व्रत कथा का पाठ कर व्रत का पारण करें।
शनि प्रदोष व्रत के नियम
- व्रत के दिन क्रोध, झूठ, निंदा और तामसिक भोजन से दूर रहें।
- सात्विक जीवनशैली अपनाएं और जरूरतमंद लोगों की सहायता करें।
- भगवान शिव और शनिदेव की पूजा श्रद्धा एवं शुद्ध मन से करें।
- यदि संभव हो तो शाम के समय शिव मंदिर में दीपक जलाएं और दान-पुण्य करें।
धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनि प्रदोष व्रत करने से भगवान शिव प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं। साथ ही शनिदेव की कृपा प्राप्त होने से शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या और अन्य अशुभ प्रभावों में राहत मिलने की मान्यता है। यह व्रत वैवाहिक जीवन में सुख, संतान प्राप्ति, व्यापार में उन्नति, नौकरी में सफलता और परिवार में सुख-शांति के लिए भी विशेष फलदायी माना जाता है।
हालांकि, धार्मिक मान्यताएं आस्था पर आधारित होती हैं और इनके प्रभाव को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं किया गया है। श्रद्धालु अपनी आस्था और परंपरा के अनुसार इस व्रत का पालन करते हैं।






