‘लोग मुझे कमजोर समझेंगे’ की सोच मदद मांगने से रोकती है, विशेषज्ञों ने बताए संकेत

घर हो या ऑफिस, कई लोग हर जिम्मेदारी अकेले निभाने की कोशिश करते हैं। उन्हें दूसरों से मदद मांगने में झिझक होती है क्योंकि उन्हें डर रहता है कि कहीं लोग उन्हें कमजोर, अयोग्य या दूसरों पर निर्भर न समझ लें। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह व्यवहार लंबे समय से बना हुआ है और व्यक्ति जरूरत होने पर भी किसी से सहायता नहीं मांग पाता, तो कुछ मामलों में यह ट्रॉमा रिस्पॉन्स या पुराने नकारात्मक अनुभवों से जुड़ा व्यवहार हो सकता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि बचपन में लगातार आलोचना, उपेक्षा, भावनात्मक असुरक्षा या बार-बार निराशा का सामना करने वाले कुछ लोगों में यह विश्वास विकसित हो सकता है कि उन्हें हर समस्या अकेले ही हल करनी होगी। समय के साथ यह आदत तनाव, चिंता, मानसिक थकान (बर्नआउट) और रिश्तों में दूरी का कारण बन सकती है।

हालांकि, हर व्यक्ति का अकेले काम करना ट्रॉमा का संकेत नहीं होता। कई लोग स्वभाव से आत्मनिर्भर होते हैं। फर्क तब पड़ता है जब मदद मांगने का विचार ही डर, शर्म या अपराधबोध पैदा करने लगे और इसका असर रोजमर्रा की जिंदगी, काम या रिश्तों पर दिखने लगे।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि जरूरत पड़ने पर भरोसेमंद परिवार, मित्र या सहकर्मी से मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि एक स्वस्थ व्यवहार है। यदि यह समस्या लंबे समय से बनी हुई है और जीवन को प्रभावित कर रही है, तो किसी मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से परामर्श लेना लाभदायक हो सकता है।






