अनीस मंसूरी ने दलित मुस्लिम-ईसाई समुदायों को समान अधिकार देने की मांग की

लखनऊ। पसमांदा मुस्लिम समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री अनीस मंसूरी ने 10 अगस्त 1950 को लागू हुए संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश के पैरा-3 को लेकर सामाजिक न्याय और संवैधानिक समानता का सवाल उठाया है।
अनीस मंसूरी ने कहा कि वर्ष 1950 में लागू व्यवस्था में अनुसूचित जाति की पहचान को धर्म से जोड़ दिया गया था। उनके अनुसार, बाद में वर्ष 1956 में सिखों और 1990 में बौद्धों को इस दायरे में शामिल किया गया, जबकि दलित मुस्लिम और दलित ईसाई समुदाय अब भी अनुसूचित जाति के संवैधानिक प्रावधानों से बाहर हैं।

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि जातिगत भेदभाव व्यक्ति का धर्म देखकर नहीं होता, तो सामाजिक न्याय और संवैधानिक संरक्षण का अधिकार धर्म के आधार पर अलग-अलग क्यों तय किया जाए? उनके मुताबिक समान सामाजिक परिस्थितियों और जातिगत पृष्ठभूमि वाले लोगों के लिए संवैधानिक अधिकारों का पैमाना भी समान होना चाहिए।
अनीस मंसूरी ने कहा कि जातिगत भेदभाव किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है और सामाजिक उत्पीड़न का स्वरूप भी धार्मिक पहचान से तय नहीं होना चाहिए। उन्होंने केंद्र सरकार से संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 के पैरा-3 में मौजूद धर्म आधारित प्रतिबंध को समाप्त करने तथा दलित मुस्लिम और दलित ईसाई समुदायों को समान संवैधानिक अधिकार देने की मांग की।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में किसी व्यक्ति की सामाजिक वंचना का निर्धारण उसके मजहब के आधार पर नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार, सामाजिक न्याय की व्यवस्था को समानता और धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।






