बिना अन्न-जल के रखा जाने वाला यह कठिन व्रत क्यों है इतना खास? पढ़ें कथा, महत्व, मुहूर्त और पारण का समय

नई दिल्ली: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व माना जाता है, लेकिन निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे कठिन और पुण्यदायी व्रत माना जाता है। इस दिन श्रद्धालु बिना अन्न और बिना जल के उपवास रखते हैं, इसलिए इसे निर्जला एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस एक व्रत को करने से वर्षभर की सभी 24 एकादशियों का फल प्राप्त होता है।

क्यों कहते हैं भीमसेनी एकादशी?
निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। इसके पीछे महाभारत काल की एक पौराणिक कथा जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, पांडवों में भीमसेन को भोजन अत्यंत प्रिय था और उनके लिए नियमित रूप से एकादशी व्रत रखना कठिन था। तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी पर निर्जला व्रत रखने की सलाह दी। कहा गया कि यदि भीम इस एक दिन बिना अन्न और जल के व्रत रखेंगे, तो उन्हें सभी एकादशियों के बराबर पुण्य मिलेगा। तभी से इसे भीमसेनी एकादशी कहा जाने लगा।

निर्जला एकादशी का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करने और व्रत रखने से सुख-समृद्धि, आरोग्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन जलदान, अन्नदान, वस्त्रदान और जरूरतमंदों की सहायता करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
पूजा विधि
- सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएं।
- तुलसी दल, पीले फूल, फल और पंचामृत अर्पित करें।
- विष्णु सहस्रनाम या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
- पूरे दिन निर्जला उपवास रखें और रात्रि जागरण करें।
नोट: पंचांग के अनुसार समय में क्षेत्र के अनुसार थोड़ा अंतर संभव है।






