कभी अमृत समान मानी जाने वाली गंगा आज प्रदूषण, घटते जलप्रवाह और अंधाधुंध दोहन से जूझ रही है; विशेषज्ञों ने जताई गंभीर चिंता

भारत की आस्था, संस्कृति और सभ्यता की प्रतीक गंगा नदी आज अपने अस्तित्व के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। कभी ‘गंगा तेरा पानी अमृत’ कहे जाने वाली यह पावन धारा अब प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप के कारण गंभीर संकट में है। पर्यावरणविदों का कहना है कि गंगा की सबसे बड़ी समस्या अब उसका घटता प्राकृतिक प्रवाह है, जिससे उसकी स्वयं को साफ करने की क्षमता लगातार कमजोर हो रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, गंगा बेसिन के शहरों से प्रतिदिन हजारों मिलियन लीटर सीवेज निकलता है, जिसका बड़ा हिस्सा बिना शोधन के सीधे नदी में पहुंच जाता है। औद्योगिक कचरा, प्लास्टिक प्रदूषण और अनियंत्रित शहरीकरण ने हालात को और गंभीर बना दिया है। वहीं ग्लोबल वार्मिंग, कमजोर मानसून और सिंचाई के लिए अत्यधिक जल दोहन ने नदी के प्राकृतिक बहाव को प्रभावित किया है।

ऋषिकेश, हरिद्वार, प्रयागराज और वाराणसी जैसे प्रमुख तीर्थस्थलों पर भी गंगा का जल गुणवत्ता मानकों पर खरा नहीं उतर रहा। कई स्थानों पर बैक्टीरिया का स्तर सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक पाया गया है। श्रद्धालु जहां आस्था के साथ गंगा में स्नान और आचमन कर रहे हैं, वहीं वैज्ञानिक रिपोर्टें जल की खराब होती स्थिति की ओर इशारा कर रही हैं।
पर्यावरणविदों का मानना है कि केवल घाटों की सफाई या योजनाओं की घोषणा से समस्या का समाधान नहीं होगा। उद्योगों और शहरों के अपशिष्ट जल का शत-प्रतिशत उपचार, भूजल दोहन पर नियंत्रण, नदी में न्यूनतम पारिस्थितिक प्रवाह सुनिश्चित करना और जनभागीदारी बढ़ाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि गंगा को उसका प्राकृतिक प्रवाह वापस नहीं मिला

और प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है। गंगा को बचाना केवल एक नदी को बचाना नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, संस्कृति और भविष्य को सुरक्षित करना है।






