लोड बढ़ाने से पहले सूचना न देने और फिक्स चार्ज वसूली पर उठे सवाल।

उत्तर प्रदेश में बिजली उपभोक्ताओं के बीच बिजली कनेक्शन का स्वीकृत भार (लोड) स्वतः बढ़ाए जाने को लेकर विवाद गहरा गया है। उपभोक्ता संगठनों का आरोप है कि बिजली कंपनियां बिना पूर्व सूचना दिए लाखों उपभोक्ताओं का लोड बढ़ा रही हैं, जिससे उनके बिजली बिल, फिक्स चार्ज और सिक्योरिटी राशि में बढ़ोतरी हो रही है। वहीं, लोड कम कराने की प्रक्रिया जटिल होने के कारण उपभोक्ताओं को राहत नहीं मिल पा रही है।
जानकारी के अनुसार, प्रदेश में करीब 3.73 करोड़ बिजली उपभोक्ता हैं। बिजली कंपनियां तीन महीनों की अधिकतम बिजली खपत के औसत के आधार पर उपभोक्ताओं का स्वीकृत भार बढ़ा रही हैं। हालांकि नियमों के मुताबिक, अधिकांश मामलों में लोड बढ़ाने से पहले उपभोक्ता को सूचना देना आवश्यक है। उपभोक्ताओं का कहना है कि उन्हें इसकी जानकारी तब मिलती है जब बढ़े हुए फिक्स चार्ज के साथ बिजली बिल उनके पास पहुंचता है।
विवाद का सबसे बड़ा कारण यह है कि यदि किसी उपभोक्ता का लोड बढ़ जाता है और बाद में उसकी बिजली खपत कम हो जाती है, तब भी लोड अपने आप कम नहीं किया जाता। उपभोक्ता को आवेदन देना पड़ता है, दस्तावेज जमा करने पड़ते हैं और कई बार उपकेंद्रों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। इसके बाद भी यदि जांच रिपोर्ट अनुकूल न हो तो लोड कम नहीं किया जाता। इतना ही नहीं, लोड घटने पर फिक्स चार्ज में भी पूरी राहत नहीं मिलती और केवल लगभग 75 प्रतिशत तक ही कमी की जाती है।
उपभोक्ता परिषद का दावा है कि हाल ही में प्रदेश के लगभग 47 लाख बिजली उपभोक्ताओं का लोड एक साथ बढ़ा दिया गया। परिषद ने मांग की है कि जिस प्रकार सिस्टम के जरिए स्वतः लोड बढ़ाया जाता है, उसी प्रकार बिजली खपत कम होने पर उसे स्वतः घटाने की व्यवस्था भी लागू की जाए, ताकि उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े।
वहीं, पावर कॉर्पोरेशन का कहना है कि बढ़ते बिजली भार के अनुरूप ट्रांसफॉर्मर और वितरण व्यवस्था का प्रबंधन करना आवश्यक है। अधिकारियों के अनुसार, यदि किसी क्षेत्र में लोड बढ़ने के बावजूद उसे अपडेट नहीं किया जाए तो ट्रांसफॉर्मर पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। विभाग का कहना है कि उपभोक्ता के आवेदन और सत्यापन के बाद लोड कम किया जाता है तथा सिक्योरिटी राशि पर नियमानुसार ब्याज भी दिया जाता है।






